लोकसभा चुनाव से पहले नोटबंदी को लेकर फिर से घिरी बीजेपी


आज से ठीक दो साल पहले 8 नवंबर 2016 को मोदी सरकार ने नोटबंदी का ऐलान किया था. जिसमे 500 और 1000 के नोटों को बंद कर दिया गया था. सरकार ने इसे अपनी बड़ी उप्लपधि बताई थी. पर जो खुलासा हुआ है उसके मुताबिक सरकार फिर से नोटबंदी को लेकर सवालों के घेरे में आ रही है.

दरअसल डेक्कन हेराल्ड में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक एक आरटीआई से ये खुलासा हुआ है कि मोदी सरकार ने आरबीआई की सहमती के बिना ही नोटबंदी का ऐलान कर दिया था. रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई बोर्ड की बैठक नोटबंदी के ऐलान के बस ढाई घंटे पहले यानी शाम 5 बज कर तीस मिनट पर हुई थी और बोर्ड की मंज़ूरी मिले बिना प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का ऐलान कर दिया था.

बताया ये भी जा रहा है कि आरबीआई ने 16 दिसंबर, 2016 को सरकार को प्रस्ताव की मंज़ूरी भेजी यानी ऐलान के 38 दिन बाद आरबीआई ने ये मंज़ूरी भेजी थी.

इन सब के अलावा भी रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि वित्त मंत्रालय के प्रस्ताव की बहुत सारी बातों से आरबीआई बोर्ड सहमत नहीं था. मंत्रालय के मुताबिक 500 और 1000 के नोट 76% और 109% की दर से बढ़ रहे थे जबकि अर्थव्यवस्था 30% की दर से बढ़ रही थी.

आरबीआई बोर्ड का मानना था कि मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए बहुत मामूली अंतर है. आरबीआई के निदेशकों का कहना था कि काला धन कैश में नहीं, सोने या प्रॉपर्टी की शक्ल में ज़्यादा है और नोटबंदी का काले धन के कारोबार पर बहुत कम असर पड़ेगा. इतना ही नहीं, निदेशकों का कहना था कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा.

पर फिर भी मोदी सरकार ने नोटबंदी ऐलान कर दिया था वहीं सरकार का ये मन्ना था कि नोटबंदी से 500 और 1,000 रुपये के नोटों की संख्या में तेज वृद्धि और नकली नोटों के सर्कुलेशन पर कड़ा प्रहार होगा। साथ ही, ई-पेमेंट्स और फाइनैंशल इन्क्लूजन को बढ़ावा मिलेगा.चुनाव के इस माहोल में नोटबंदी पर सरकार को घेरने के लिए विपक्ष को एक अच्छा मुद्दा मिल गया है. जिसे विपक्ष नहीं गवांना चाहेंगा.

दूसरी तरफ आरटीआई के खुलासे के बाद सरकार के नोटबंदी पर लिए फैसले पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा रहा है.


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