फिल्म में है अभी वक्त, उससे पहले जानें रानी Padmavati की सच्ची कहानी


फिल्म पद्मावती का इंतजार हो रहा मुश्किल!

जब से फिल्म पद्मावती का ट्रेलर लॉन्च हुआ है, फैन्स के बीच फिल्म का इंतजार करना काफी मुश्किल हो गया है। ऐसा लग रहा है मानों बस लोगों को ये फिल्म देखनी ही है। स्क्रीन पर रानी पद्मावती, चितौड़ के राजा रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी का लुक देखने के बाद फैन्स अपने आप को रोक नहीं पा रहे। हालांकि संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ दिसंबर को रिलीज होगी, लेकिन फिल्म की कहानी को लेकर काफी दिनों पहले से ही बातें शुरू हो गई हैं।

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आप सबको मालूम ही होगा कि फिल्म की कहानी को लेकर बहुत सारे विवाद सामने आ रहे हैं। देशभर से कई संगठन इसका विरोध भी कर रहे हैं। उनका आरोप है कि फिल्म में स्क्रिप्ट के साथ छेड़छाड़ की गई है। फिल्म में कहानी जो भी हो, लेकिन आइए हम आपको लिए चलते हैं रानी पद्मावती की दुनिया में। जहां आप ये जान सकेंगे कि कौन थीं रानी पद्मावती और क्या हुआ था उनके साथ।

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कौन थीं रानी पद्मावती

रानी पद्मिनी यानि पद्मावती के पिता का नाम गंधर्वसेन और माता का नाम चंपावती था। रानी पद्मिनी के पिता गंधर्वसेन सिंहल प्रान्त के राजा थे। रानी पद्मिनी बचपन से ही बहुत सुंदर थीं। कहते हैं उनकी सुंदरता के चर्चे दूर- दूर तक थे। रानी पद्मिनी के बड़ी होने पर उनके पिता ने उनका स्वयंवर आयोजित किया। इस स्वयंवर में उन्होंने सभी हिन्दू राजाओं और राजपूतों को बुलाया। एक छोटे प्रदेश का राजा मलखान सिंह भी उस स्वयंवर में आया था।

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राजा रतन सिंह और रानी पद्मिनी का विवाह

राजा रावल रतन सिंह भी पहले से ही अपनी एक पत्नी नागमती होने के बावजूद स्वयंवर में गये थे। प्राचीन समय में राजा एक से अधिक विवाह करते थे ताकि वंश को अधिक उत्तराधिकारी मिले। राजा रावल रतन सिंह ने मलखान सिंह को स्वयंवर में हराकर रानी पद्मिनी से विवाह कर लिया। विवाह के बाद वो अपनी दुसरी पत्नी पद्मिनी के साथ वापस चित्तौड़ लौट आये।

राघव चेतन को क्यों आया गुस्सा ?

उस समय चित्तौड़ पर राजपूत राजा रावल रतन सिंह का राज था। एक अच्छे शासक और पति होने के अलावा रतन सिंह कला के संरक्षक भी थे। उनके ददरबार में कई प्रतिभाशाली लोग थे जिनमे से राघव चेतन संगीतकार भी एक था। राघव चेतन के बारे में लोगों को ये पता नहीं था कि वो एक जादूगर भी है। वो अपनी इस बुरी प्रतिभा का उपयोग दुश्मन को मार गिराने में करता था। एक दिन राघव चेतन का बुरी आत्माओं को बुलाने का कृत्य रंगे हाथों पकड़ा जाता है। इस बात का पता चलते ही रावल रतन सिंह ने उग्र होकर उसका मुंह काला करवाकर और गधे पर बिठाकर अपने राज्य से निर्वासित कर दिया। रतन सिंह की इस कठोर सजा के कारण राघव चेतन उसका दुश्मन बन गया।

अपने अपमान से नाराज होकर राघव चेतन दिल्ली चला गया। जहां पर वो दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए उकसाने का लक्ष्य लेकर गया। दिल्ली पहुंचने पर राघव चेतन दिल्ली के पास एक जंगल में रुक गया, जहां पर सुल्तान अक्सर शिकार के लिया आया करते थे। एक दिन जब उसको पता चला कि की सुल्तान का शिकार दल जंगल में प्रवेश कर रहा है तो राघव चेतन ने अपनी बांसुरी से मधुर स्वर निकालना शुरू कर दिया।

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सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी से राघव चेतन की मुलाकात

जब राघव चेतन की बांसुरी के मधुर स्वर सुल्तान के कानों तक पहुंचे तो सुल्तान ने अपने सैनिकों को बांसुरी वादक को ढूंढ कर लाने को कहा। जब राघव चेतन को उसके सैनिकों ने अलाउद्दीन खिलजी के समक्ष प्रस्तुत किया तो सुल्तान ने उसकी प्रशंसा करते हुए उसे अपने दरबार में आने को कहा। चालाक राघव चेतन ने उसी समय राजा से पूछा कि ‘आप मुझ जैसे साधारण संगीतकार को क्यों बुलाना चाहते हैं, जबकि आपके पास कई सुंदर वस्तुएं हैं’।
राघव चेतन की बात ना समझते हुए खिलजी ने साफ़ साफ़ बात बताने को कहा। राघव चेतन ने सुल्तान के सामने रानी पद्मिनी की सुन्दरता का बखान किया, जिसे सुनकर खिलजी की वासना जाग उठी। अपनी राजधानी पहुंचने के तुरंत बात उसने अपनी सेना को चित्तौड़ पर आक्रमण करने को कहा क्योंकि उसका सपना उस सुन्दरी को अपने हरम में रखना था।
चित्तौड़ पहुंचने के बाद अलाउदीन को चित्तौड़ का किला भारी रक्षण में दिखा। रानी पद्मिनी की एक झलक पाने के लिए सुल्तान ने राजा रतन सिंह को ये संदेशा भिजवाया कि वो रानी पद्मिनी को अपनी बहन समान मानता है और उससे मिलना चाहता है। सुल्तान की बात सुनते ही रतन सिंह अपना राज्य बचाने के लिए उसकी बात से सहमत हो गया। रानी पद्मिनी अलाउदीन को कांच में अपना चेहरा दिखाने के लिए राजी हो गयी। जब अलाउदीन को ये खबर पता चली कि रानी पद्मिनी उससे मिलने को तैयार हो गयी है वो अपने चुनिन्दा योद्धाओं के साथ सावधानी से किले में प्रवेश कर गया।

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जब रानी पद्मिनी की देखी एक झलक…

रानी पद्मिनी के सुंदर चेहरे को कांच के प्रतिबिम्ब में जब अलाउदीन खिलजी ने देखा तो उसने सोच लिया कि रानी पद्मिनी को अपनी बनाकर रहेगा। वापस अपने शिविर में लौटते वक़्त अलाउदीन कुछ समय के लिए रतन सिंह के साथ चल रहा था। खिलजी ने मौका देखकर रतन सिंह को बंदी बना लिया और पद्मिनी की मांग करने लगा। चौहान राजपूत सेनापति गोरा और बादल ने सुल्तान को हराने के लिए एक चाल चलते हुए खिलजी को संदेशा भेजा कि अगली सुबह पद्मिनी को सुल्तान खिलजी को सौंप दिया जाएगा।
अगले दिन सुबह ही 150 पालकियां किले से खिलजी के शिविर की तरफ रवाना हुई। पालकियां वहां रुक गयी, जहां पर रतन सिंह को बंदी बना रखा था। अचानक से उसमें से पूरी तरह से सशस्त्र सैनिक निकलें और रतन सिंह को छुड़वा लिया।

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खिलजी का चितौड़ पर आक्रामण

जब सुल्तान को पता चला कि उसके योजना नाकाम हो गयी, सुल्तान ने गुस्से में आकर अपनी सेना को चित्तौड़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया। युद्ध में चितौड़ के राजा रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। ये सुनकर रानी पद्मिनी ने सोचा कि अब सुल्तान की सेना चित्तौड़ के सभी पुरुषों को मार देगी। अब चित्तौड़ की औरतों के पास दो विकल्प थे या तो वो जौहर के लिए प्रतिबद्ध हो या विजयी सेना के समक्ष अपना निरादर सहे।

रानी पद्मिनी ने किया जौहर

सभी महिलाओं का पक्ष जौहर की तरह था। एक विशाल चित्ता जलाई गयी और रानी पद्मिनी के बाद चित्तौड़ की सारी औरतें उसमे कूद गयी और इस प्रकार दुश्मन बाहर खड़े देखते रह गय। जिन महिलाओं ने जौहर किया उनकी याद आज भी लोकगीतों में जीवित है, जिसमें उनके गौरवान्वित कार्य का बखान किया जाता है।

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